विश्वविद्यालय

प्राचीन भारत के ज्ञान को पुनर्जीवित करने का संकल्प

पंचगव्य विश्वविद्यालय के लिए भूमि पूजा संपन्न
“भारतीये तकनीकी ज्ञान को समर्पित गुरुकुलिये विश्वविद्यालय” का निर्माण कार्य शुरू
महाऋषि वाग्भट्ट गोशाला, कांचीपुरम के नियोजन में जब वर्ष 2007 के बाद अ.ब.राजीव भाई स्वस्थ कथा करने लगे तब लगा की आज देश को सबसे पहले इसी की जरुरत है. जब तक देशवाशी स्वयं निरोगी नहीं हो जाते तब तक भला वे देश के लिए क्या सोच पाएंगे. इसी सोंच के साथ उन्होंने 3 स्वास्थ कथा चेन्नै में किया. पहली कथा 7 दिनों की हुई, दूसरी 9 दिनों की और तीसरी और अंतिम 13 दिनों की हुई. इसके बाद योगगुरु बाबा रामदेवजी ने उन्हें ससंस्कर गोद लिया और वे हरिद्वार चले गए.

उन्होंने हरिद्वार जाने का जो निर्णय लिया इसके पीछे कुछ षडयंत्रकारियों की भूमिका थी, जो की एक अलग विषय है. जाने से पहले उन्होंने आज़ादी बचाओ आन्दोलन के साथिओं के साथ बैठक किये और सहमति चाही लेकिन सहमति नहीं मिली. बार बार इसी विषय पर बैठक हुई लेकिन सहमति नहीं बनी. अंत में हार कर साथियों को हाँ कहना पड़ा. और वे चले गए. कारण – यहाँ पर योगगुरु बाबा रामदेवजी का आग्रह भारी पड़ा था.

जाने से पहले उन्होंने कुछ जरुरी कार्य किये थे जिनमें 1) स्वदेशी भारत पीठम की स्थापना, जिसका पंजीकरण कर्नाटक से हुआ था. और 2) आज़ादी बचाओ आन्दोलन का पंजीकरण. इसके अलावा भी और कई भावी योजनायें थी. जिनमे से एक कांचीपुरम स्थित महाऋषि वाग्भट्ट गोशाला के सानिध्य में एक पंचगव्य विश्वविद्यालय की स्थापना. जहाँ पर गोमाता के विज्ञान की पढाई शुरू हो सके. भारत स्वाभिमान में व्यस्थता होने के कारण पंचगव्य विश्वविद्यालय का कम तेजी नहीं पकड़ सका. वर्ष 2010 आ गया. 29-30 नवम्बर (काल भैरव अष्टमी) की रात वे नहीं रहे. लगा सब कुछ समाप्त हो गया. लेकिन उनके सुक्ष्म शरीर और गोमाता ने दिशा, साहस और बुद्धि दी. रुका हुआ कार्य आगे बढ़ा. वर्ष 2012 में एक छोटी सफलता मिली. महाऋषि वाग्भट्ट गोशाला द्वारा संचालित पंचगव्य गुरूकुलम जिसमें पंचगव्य चिकित्सा शिक्ष दी जा रही थी उसकी मान्यता भारत सरकार के संसदीय बोर्ड ने मास्टर डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी के रूप में दे दी. जिसमें डॉ. जी. मणि की बड़ी भूमिका रही. अभी तक लगभग 500 विद्यार्थियों ने इसका लाभ लिया है. यहाँ की शिक्ष प्राप्त किये हुए गोसेवक भाई – बहन डॉ गव्यसिद्ध कहलाते हैं. आज देश में इनके द्वारा ज्यादातर उन मरीजों की चिकित्सा हो रही है जिनके रोग असाध्य कहे गए. लगभग सभी असाध्य कहे जाने वाले रोग ठीक हो रहे हैं. इनकी सफलता ही हमें अब पंचगव्य विश्वविद्यालय बनाने को प्रेरित कर रहा है.

विश्वविद्यालय के निर्माण की प्रक्रिया अब तेजी पकड़ रहा है. इसका नाम : पंचगव्य विश्वविद्यालय : रखा गया है. यह विश्वविद्यालय पंचगव्य गुरूकुलम, ट्रस्ट पंजी. (PANCHGAVYA GURUKULAM, Trust. Regd.) के अंतर्गत कम करेगा.

इसमें दिए जाने वाले ज्ञान का मुख्य विषय इस प्रकार होगा.

  1. पंचगव्य चिकित्सा में स्नातक और विद्यावारिधि (PHD) (महाऋषि वाग्भट्ट)
  2. पंचगव्य के माध्यम से शल्यचिकित्सा (महाऋषि सुश्रुत)
  3. ऋषि कणाद का गति विज्ञान
  4. ऋषि भऋगु का विमान शास्त्र और
  5. ऋषि घाघ-भडरी का मोसम विज्ञान

पंचगव्य गुरूकुलम की निर्माण प्रक्रिया आखा तीज (अप्रैल) 20 16 से आरम्भ होगा.

इसके लिए महर्षि वाग्भट्ट गोशाला एवं पंचगव्य अनुसन्धान केंद्र के पास ही अलग से भूमि का छोटा टुकड़ा खरीद लिया गया है. और भूमि खरीदने की प्रक्रिया चल रही है. जो गोप्रेमी भाई – बहन इसके निर्माण में योगदान देना चाहते हैं वे सीधे गव्यसिद्धाचार्य डॉ. निरंजन भाई वर्मा गुरूजी से सीधे संपर्क कर सकते हैं. मोबाइल 09 444 03 47 23. ईमेल gomaata@gmail.com.

बैंक विवरण
पंचगव्य गुरूकुलम / Panchgavya Gurukulam
खाता संख्या (कैरेंट अकाउंट/Current Account) संख्या – 0641 02 0000 1406.
IFSC Code. BARB 0 PURASA (Fifth Character is Zero)
MICR Code. 6000 120 11.
बैंक ऑफ़ बडोदा / Bank Of Baroda
पुरुसैवाल्कम शाखा / Purusaiwalkam Branch, चेन्नै / Chennai.

प्राचीन भारत के ज्ञान की एक झलक – नालंदा विश्वविद्यालय

एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव वाला तुर्क लूटेरा था….बख्तियार खिलजी.
इसने ११९९ इसे जला कर पूर्णतः नष्ट कर दिया। उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था. एक बार वह बहुत बीमार पड़ा उसके हकीमों ने उसको बचाने की पूरी कोशिश कर ली … मगर वह ठीक नहीं हो सका. किसी ने उसको सलाह दी… नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र जी को बुलाया जाय और उनसे भारतीय विधियों से इलाज कराया जाय उसे यह सलाह पसंद नहीं थी कि कोई भारतीय वैद्य … उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान रखते हो और वह किसी काफ़िर से .उसका इलाज करवाए फिर भी उसे अपनी जान बचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा उसने वैद्यराज के सामने शर्त रखी… मैं तुम्हारी दी हुई कोई दवा नहीं खाऊंगा… किसी भी तरह मुझे ठीक करों … वर्ना …मरने के लिए तैयार रहो.

बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई… बहुत उपाय सोचा… अगले दिन उस सनकी के पास कुरान लेकर चले गए.. कहा…इस कुरान की पृष्ठ संख्या … इतने से इतने तक पढ़ लीजिये… ठीक हो जायेंगे…! उसने पढ़ा और ठीक हो गया .. जी गया… उसको बड़ी झुंझलाहट हुई…उसको ख़ुशी नहीं हुई उसको बहुत गुस्सा आया कि … उसके मुसलमानी हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है…! बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले …उनको पुरस्कार देना तो दूर … उसने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया …पुस्तकालयों को ही जला के राख कर दिया…! वहां इतनी पुस्तकें थीं कि …आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकें धू धू करके जलती रहीं उसने अनेक धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले.

दुर्भाग्य आज के भारत में उस बख्तियार खिलजी के नाम पर रेलवे स्टेशन हैं… !

कुरान पढ़ के वह कैसे ठीक हुआ था –  हिन्दू किसी भी धर्म ग्रन्थ को जमीन पर रख के नहीं पढ़ते… थूक लगा के उसके पृष्ठ नहीं पलटते इस्लाम में ठीक उलटा होता है. कुरान के हर पेज को थूक लगा लगा के पलटते हैं…! बस… वैद्यराज राहुल श्रीभद्र जी ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था… वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया…ठीक हो गया और उसने इस एहसान का बदला नालंदा को नेस्तनाबूत करके दिया.

क्या था नालंदा विश्वविद्यालय

यह प्राचीन भारत में उच्च् शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध-धर्म के साथ ही अन्य धर्मों के तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। वर्तमान बिहार राज्य में पटना से 88.5 किलोमीटर दक्षिण–पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर उत्तर में एक गाँव के पास अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा खोजे गए इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज़ करा देते हैं। अनेक पुराभिलेखों और सातवीं शती में भारत भ्रमण के लिए आये चीनी यात्री ह्वेनसांग तथा इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में यहाँ जीवन का महत्त्वपूर्ण एक वर्ष एक विद्यार्थी और एक शिक्षक के रूप में व्यतीत किया था। प्रसिद्ध ‘बौद्ध सारिपुत्र’ का जन्म यहीं पर हुआ था।

स्थापना व संरक्षण

इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ४५०-४७० को प्राप्त है। इस विश्वविद्यालय को कुमार गुप्त के उत्तराधिकारियों का पूरा सहयोग मिला। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवर्द्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। स्थानिए शासकों तथा भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ ही इसे अनेक विदेशी शासकों से भी अनुदान मिला।

स्वरूप

यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति में इसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २००० थी। इस विश्वविद्यालय में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं शती से बारहवीं शती तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। परिसर अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे। इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक इत्यादि रखने के लिए आले बने हुए थे। प्रत्येक मठ के आँगन में एक कुआँ बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष तथा अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे तथा झीलें भी थी।

प्रबंधन

समस्त विश्वविद्यालय का प्रबंध कुलपति या प्रमुख आचार्य करते थे जो भिक्षुओं द्वारा निर्वाचित होते थे। कुलपति दो परामर्शदात्री समितियों के परामर्श से सारा प्रबंध करते थे। प्रथम समिति शिक्षा तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य देखती थी और द्वितीय समिति सारे विश्वविद्यालय की आर्थिक व्यवस्था तथा प्रशासन की देख–भाल करती थी। विश्वविद्यालय को दान में मिले दो सौ गाँवों से प्राप्त उपज और आय की देख–रेख यही समिति करती थी। इसी से सहस्त्रों विद्यार्थियों के भोजन, कपड़े तथा आवास का प्रबंध होता था। 

आचार्य

इस विश्वविद्यालय में तीन श्रेणियों के आचार्य थे जो अपनी योग्यतानुसार प्रथम, द्वितीय और तृतीय श्रेणी में आते थे। नालंदा के प्रसिद्ध आचार्यों में शीलभद्र, धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमति और स्थिरमति प्रमुख थे। 7वीं सदी में ह्वेनसांग के समय इस विश्व विद्यालय के प्रमुख शीलभद्र थे जो एक महान आचार्य, शिक्षक और विद्वान थे। एक प्राचीन श्लोक से ज्ञात होता है, प्रसिद्ध भारतीय गणितज्ञ एवं खगोलज्ञ आर्यभट भी इस विश्वविद्यालय के प्रमुख रहे थे। उनके लिखे जिन तीन ग्रंथों की जानकारी भी उपलब्ध है वे हैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। ज्ञाता बताते हैं, कि उनका एक अन्य ग्रन्थ आर्यभट्ट सिद्धांत भी था, जिसके आज मात्र ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। इस ग्रंथ का ७वीं शताब्दी में बहुत उपयोग होता था।

प्रवेश के नियम

प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिन होती थी और उसके कारण प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हें तीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथम ऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक था। अध्ययन-अध्यापन पद्धति इस विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। इसके अतिरिक्त पुस्तकों की व्याख्या भी होती थी।शास्त्रार्थ होता रहता था। दिन के हर पहरमें अध्ययन तथा शंका समाधानचलता रहता था।

अध्ययन क्षेत्र

यहाँ महायान के प्रवर्तक नागार्जुन, वसुबन्धु, असंग तथा धर्मकीर्ति की रचनाओं का सविस्तार अध्ययन होता था। वेद, वेदांत और सांख्य भी पढ़ाये जाते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र तथा चिकित्साशास्त्र भी पाठ्यक्रम के अन्तर्गत थे। नालंदा कि खुदाई में मिलि अनेक काँसे की मूर्तियोँ के आधार पर कुछ विद्वानों का मत है कि कदाचित् धातु की मूर्तियाँ बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहाँ खगोलशास्त्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था।

पुस्तकालय

नालंदा में सहस्रों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था जिसमें ३ लाख से अधिक पुस्तकों का अनुपम संग्रह था। इस पुस्तकालय में सभी विषयों से संबंधित पुस्तकें थी। यह ‘रत्नरंजक’ ‘रत्नोदधि’ ‘रत्नसागर’ नामक तीन विशाल भवनों में स्थित था। ‘रत्नोदधि’ पुस्तकालय में अनेक अप्राप्य हस्तलिखित पुस्तकें संग्रहीत थी। इनमें से अनेक पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ चीनी यात्री अपने साथ ले गये थे।.

74 Responses

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  3. Mai panchgavya me master diploma karna chata hu……jameshadpur jarkhand me sivir ho raha hai 22sep se kirpa muje uski jankari dijiye………ya phir mai kaha se master diploma kar sakta hu uski jankai dijiye..

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  9. Guru ji kya April me koi batch suru hoga

  10. Dear sir,
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    Thanks & Regards
    Harish Sharma

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  14. Sir,
    Please send me Application format.

  15. How to send form soft or hard ?

  16. श्रीमान्

    क्या पंचगव्य से संबंधित शिक्षा corespondace
    द्वारा प्राप्त किया जा सकता है|

    निवेदक:-
    डॉ. रविकान्त शुभम्
    होमियोपैथ
    चतरा(झारखण्ड)

  17. PRANAN VARMA GURUJEE,

    AAPANE NALANDA VISHVA VIDYALAY KE BARE ME JO JANKARI DEE, VAH PADHKE KHUSHI SE AANSU SAMA NAHEE PAYE. HAMARE BHARAT VARSHA ME ITNE MAHATVAPURNA VISHVA VIDYALAY BANE, YAH PADHKAR GARV HUVA. KYA AAJ KE SHASAK AISE VISHVA VIDYALAY KE BARABARI KARNEWALE SHIKSHA STROT AGALE 100 VARSHO ME BANA PAYENGE?

  18. माननीय महोदय मुझे और मेरे साथियों को पंचगव्य का कोर्स करना है आप तारीख और मध्यप्रदेश में अपना कोई अनुसन्धान केंद्र हो । तो आप कृपा करके मुझे सूचित करे।।। धन्यवाद
    गौ माता सेवक मनीष सिंह भदौरिया

  19. May wale exams me student ka name kaise pta kre ki ye exams de skta h

  20. Is it recognised by govt. Of India (ayush)

  21. I want to do course
    Kindly guide me

  22. मैने राजस्थान संस्कृत वि वि जयपुर से आचार्य किया है आदरणीय राजीवजी के विचारोंका लोगो मे प्रचार भी करता हु मै गव्यसिद्ध बनकर गौमाताकी सेवा करणा चाहता हु मेरी आर्थिक स्थिती कमजोर है कृपया मार्गदर्शन करे संपर्क 08793761008 संतोष जैन शास्त्री

    • एम् डी (पंचगव्य) एक साल का मेडीकल पढाई है इसमे कुछ जयादा नहीं लिया जाता है.
      पढाई पर केवल 19 हजार रुपये का खर्च आता है.
      आप चाहें तो जयपुर में हमारा विस्तार है वही से कर सकते हैं.

  23. guru ji m delhi ncr si hu muje ye course krna h ..aur m qualification 10 class h ..and age 21 year ..is cousre ka fee structure and overall expense kitna h …and delhi ke around konsa centre pdega ..aur classes regular h whole 1 year ya phr sirf seminar hoge is course

  24. Sir apkw dwara site par is course ki fees 19000 di + seminar ki fees 1500 per seminar bta gae ..rhene ki vyavasta aur khane pine ka intezam ke liye kitna charge hoga pure saal ki pdai ka..

  25. Sir haryana ke aas pas ke centre ka no send krdo ..

  26. Sir delhi m jo center h uska address send krdo..kal jana h muje wah

  27. HELLO SIR ME GAO PANCHAGAWAYA CHIKITSA KA COURSE KARNA CHAHTA HU TO MUJE BATAYE ME (GUJARAT SURAT) HU SO PLEASE KYA SURAT ME HO SAKTA HE ? PURI DETAIL BATAYE.

  28. Panam mahoday mera Name Bhikhuvyas hai me Radhanpur uttari Gujarat se hu. Kya aa puje aapke Gujarat me koi sampark sutra ki jankari dene ki kripa karenge?

  29. नमस्कार मुम्बई के पास कौनसा सेन्टर है और उनका दूरध्वनि क्रमांक कृपया बताये

  30. Dear Sir ,I want to join the Panchgavya course ,Is there any distance learning course available Kindly update

  31. Wanted details for panchagavya theraphy in english. Any means to contact through mail.id. please let me know

  32. ranchi se m.d in panchgavya kar sakte hai yaa nhi

  33. पानी में फ्लोराइड अधिक हो तो क्या करें?

    • पानी को प्राकृतिक विधि से साफ कर सकते हैं.
      इसमे नीम की लकड़ी का कोयला, रेत और पत्थर के तुकडे लगते हैं.
      इसके बाद गोमूत्र और सहजन की पत्ती से शुद्ध किया जा सकता हैं.

  34. Gavya sidh hone k baad kya hum as a gavyasidh dr. Ki practice kar sakte he

    Kya practice karne k liya alag se kai fees deni hoti he

    Gavyasidh hone k baad apne naam me Dr. Laga sakte he

  35. Hari om
    guru ko dandvat parnam

    Kya ham panchagvya
    M.d ka kors karke desi
    Davakhane ke
    rupme logo ki seva
    karsaktehe ?
    usakeliye konsa
    kors karna padega
    or uski avdhi kitani
    hogi or anumanit
    kharch kitana aayega

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